ब्लोग पर पधारने के लिये धन्यवाद

आतँकवाद एक कोढ की बिमारी

पेशावर (पाकिस्तान) के एक स्कूल मेँ आतँकवादियोँ द्वारा निर्दोश बच्चोँ की हत्या और उनके परिजनोँ के दुख से उपजी कुछ पक्तियाँ समर्पित हैँ.... इस घटना की जितनी निन्दा की जाये कम है... साथ ही अपराधियोँ के लिये बडे से बडा दण्ड भी कम रहेगा... शायद फाँसी भी कम पड जाये.

झर गये आशाओँ के सुमन
सूनी हरी भरी क्यारी हो गई
जालिम दरिँदोँ का क्या गया
गिनती मेँ इक शुमारी हो गई

रोयेगी माँ की आँख उम्र भर
निढाल बाप नन्हेँ की कब्र पर
ढोये बोझा किसी के पाप का
ममता आतँक की सवारी हो गई

ये हैँ न किसी देश के न धर्म के
कसाई ये, व्यापारी हैँ बस जुर्म के
इनको जड से मिटाने का वक्त है
हस्ती इनकी इक बिमारी हो गई

मोहिन्दर कुमार


गीत

मैँने भर लिया आगोश मेँ चाँद को
चाँदनी पर जहाँ मेँ फेरा लगाती रही
भुला गम को ये जहाँ बसा तो लिया
उदासी पर हर शाम डेरा लगाती रही

पहले पहल बनाई तेरी तस्वीर के रँग
दोबारा फिर कागज पर उतर न सके
रातोँ के घने काले अँधेरे सँवर न सके
यूँ किरणेँ सूरज की सवेरा सजाती रही

जीने के लिये खुद को बदल तो लिया
अपनी हर ख्वाहिश को कत्ल तो किया
कैसे चलती रहेँ साँसेँ अपनी रफ्तार से
हवा जमाने की हमेँ रास्ता दिखाती रही


मोहिन्दर कुमार