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शरीर एँव आत्मा - नाव व यात्री

शरीर एक नाव है   
एँव आत्मा एक यात्री
यही सत्य है सभी कहते हैँ
यदि यह सत्य भी है
महान तो शरीर ही हुआ ना
जीवन भर ढोता रहा जो
इस यात्री का बोझ
जो केवल मूक साथी था
इस घाट से उस घाट
की बीच की दूरी का
इस आशा मेँ इस पर सवार
किंचित यह नाव 
समय  के धारे के विपरीत
बह कर उसे मिला देगी
उस परम ब्रह्म से
जिसका वो एक अँश है
उसे क्या बोध कि
इस नाव के साथ बँधी हैँ
और बहुत सी नाँवेँ
जो विवश करती है उसे
सिर्फ बहाव के साथ बहने को
और उन नावोँ पर सवार
उस जैसे यात्री
अनसुना कर देते है
इस नाव के अंत्रनाद को


मोहिन्दर कुमार 

गजल

तुम तो चले गये बहुत से अफसाने छोड कर
चलो यादोँ ने तुम्हारी साथ मेरा निभा दिया

समझा था जिन्दगी चलती है सीधी राह पर
अच्छा हुआ तुमने मुझे  आईना दिखा दिया

बहुत देर तलक रहा तुम्हारे आने का इंतजार
फिर तुम खुश दिखे तो सब कुछ भुला दिया

अब मैँ माँगता भी तो क्या देने वाले से और
वो गैर भी तो नही था जिसने मुझे दगा दिया

बस ये साँसेँ ही नहीँ छोडती मुफलिसी मेँ साथ
साँसोँ का कर्ज था जिसने है जीना सिखा दिया

मोहिन्दर कुमार