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"बंधी हुई भिक्षा"

बीते युग में

लक्ष्मण द्वारा खिंची रेखा के भीतर से

अस्वीकार किया था रावण ने

भिक्षा का लेना

और रेखा से बाहर आकर

सीता ने बंदिनी बन विरह भोगा



आज के युग में

गरीबी की रेखा के नीचे

जीवन यापन हेतु आवश्यक

रोटी, कपडा और छत

के लिये तरसती भीड

बदल देती है मायने

"बंधी हुई भिक्षा" के

जो इससे कम पाते हैं

वह स्वर्ग सिधाते हैं

जो इससे अधिक पाते हैं
अधिकतर वो "रावण" बन जाते हैं

हाईकू

बंद पलकें
और जागते सपने
 मेरा संसार
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छुआ उसने
जाने क्या सोच कर
पुलकित मैं
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घडी के कांटे
टिक टिक टिक टिक
बीता जीवन
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निगला कौन
अंतिम पहर उस
सोते चांद को
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धूप जलाती
या है शीतल करती
वहा पसीना
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नम नयन
व होठों पर कंपन
कथित मौन
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आ भी जा अब
ताक पर रख सब
वक्त नहीं है
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