ब्लोग पर पधारने के लिये धन्यवाद

मनद्वँद



चू रहा था पसीना और
पँखा वह झल रहा था
उन जग रही आँखोँ मेँ
स्वप्न कोई पल रहा था 

हिलती न थी शाख कोई
पेडोँ की कतारोँ मेँ मगर
एक तेज अँधड सा कोई
भीतर उसके चल रहा था

अनाज के कोटर थे खाली
और खाली पानी के घडे
मजबूरियोँ की ओखली मेँ
अरमान अपने दल रहा था

तर्क सँगत है ऐसे मेँ कितना
धीर पर अँकुश की नोक धरना
छीनू क्योँ न मैँ आकाश अपना
मानस मेँ लावा उबल रहा था

मोहिन्दर कुमार

कहाँ है तू

हर तरफ बिखरी है तेरी खुश्बू  
मगर यह तो बता कहाँ है तू

यक वयक गर गये सामने
दिल पर रहेगा किस तरह काबू

वहशतेँ मेरी हद से बढने लगी
ज्यूँ ज्यूँ बढती गई यह आरजू

किस्सा बादलोँ पर हो जैसे लिखा
अँजाम बन कर बरसेँ ये आँसू

तेरी यादोँ से घिरा होता हूँ तब
जब कोई नही होता आजू बाजू

मोहिंदर कुमार