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कहाँ है तू

हर तरफ बिखरी है तेरी खुश्बू  
मगर यह तो बता कहाँ है तू

यक वयक गर गये सामने
दिल पर रहेगा किस तरह काबू

वहशतेँ मेरी हद से बढने लगी
ज्यूँ ज्यूँ बढती गई यह आरजू

किस्सा बादलोँ पर हो जैसे लिखा
अँजाम बन कर बरसेँ ये आँसू

तेरी यादोँ से घिरा होता हूँ तब
जब कोई नही होता आजू बाजू

मोहिंदर कुमार

ओस मेँ भीगी औरत

वंदना जी की एक कविता से प्रेरित रचना 

ओस में भीगी औरत
पूर्ण औरत नहीं होती
धवल चपल
नवयौवना की तरुणाई
औस की बूंदों को
यौवन के ताप से
वाष्पित कर
एक कोहरे की चादर
तान देती है
जिसमें अलसाया यौवन
सावन की फ़ुहारों को तरसता
किसी मनचाही छुवन को प्रतीक्षारत
अंधेरों से निकल
रोशनी में नहा
हवा में ठहरी बूंदों से परावर्तित हो
इन्द्रधनुष हो जाना चाहता है
औस तो पहले पहर की चाह्त है
सूरज की किरणों के साथ ही मिट जायेगी
और इसे तो भीग कर
बरसों तक महकना है.

मोहिंदर कुमार