"धीमन की नौका"



वृक्ष था जब मैं
जड था
गति लुभाती मुझको
सोचा करता
काश होता मैं भी
चलायमान
क्या है नदी के
इस धारे से
उस धारे तक
मैं भी जाता जान.

सुना है लोगों को कहते
तीव्र मनोइच्छा कोई भी हो
कालान्तर में
देवयोग से
पूर्ण हो जाती है

कौन जाने यह क्या था
मेरी इच्छा की पूर्ति
मेरे जडपन का अंत
अथवा
आकारण इच्छा का दण्ड

चली आरी कुल्हाडी मुझ पर
जड से जडपन से
टूटा नाता
खण्ड खण्ड हुआ
बचा जो कुछ वह थी
छीलन और टूटन

तना रहता जो तना था
आरे पर जा कर
तख्तों में हुआ विभाजित
इक कौने में पडा हुआ मैं
था मन से पीडित और पराजित

फ़िर इक दिन
समय ने करवट बदली
आरे से
मिस्त्री के अड्डे तक आया
सधे हाथों ने
काट पीट कर
छील छाल कर
जोड तोड कर
एक्दम बदल दी मेरी काया

फ़िर रंग रोगन से लीपा पोती
और मेरा श्रृंगार हुआ
अब बेनाम नहीं
इक नाम मिला
"धीमन की नौका"
आकार बदल कर मुझे मिला
वरदान गति का
और इच्छित
नदिया तक जाने का मौका

टिप्पणी और ट्रेफ़िक पर हिन्दी ब्लाग जगत का सर्वेक्षण परिणाम

पिछले कुछ दिन इसी परीक्षण में गुजरे कि ऐसा क्या लिखा या पोस्ट किया जाये जिससे अपने ब्लोग पर भी रीडर्स का ग्राफ़ कम से कम इतना ऊंचा तो हो जाये कि दिल को तसल्ली हो. वैसे तो लिखने वाले बहुत कुछ लिख रहे हैं.. मुझ से कहीं अधिक अच्छा और आकर्षक परन्तु उन ब्लाग पर जा कर भी सन्नाटा ही हाथ लगा. बस खोपडी खुजलाई और सोचा कि थोडा शोध किया जाये कि लोगों को क्या पसन्द है. यहां एक बात साफ़ कर दूं कि पसन्द करने या यूं कहिये पोस्ट तक पहुंचने वालों .. चाहे वह उसे बाद में पढे या न पढें .. और टिप्पणी देने वालों की संख्या में जमीन आसमान का अन्तर है. इसका एक कारण शायद यह हो सकता है कि वह अपनी पोस्ट लिखते लिखते ही इतने थक जाते हैं कि टिप्पणी देने के लिये हिम्मत बचती ही नही.

विषय पर वापस आ जाते हैं कहीं यह न लगने लगे कि लिखना तो कुछ और था और लिख कुछ और दिया.

परीक्षण की इस कडी में पहले एक पांच छ: लाईन का एक विचार पोस्ट किया. मुझे लगा पहले की तरह एक दो टिप्पणी से ज्यादा कुछ मिलने वाला नहीं है मगर आशा की विपरीत 9 तिप्पणी टपकी. उस दिन साईट पर ट्रेफ़िक भी ठीक ठाक रहा.

उसके बाद की दो तीन पोस्ट में चित्र और एनीमेशन पोस्ट किया... ट्रेफ़िक तो ठीक था मगर टिप्पणी नदारद... दो दो से ही काम चलना पडा .. उसमे से भी एक सदाबहार समीर लाल जी की टिप्पणी.

फ़िर एक चुटकला पोस्ट किया .. टिप्पणी तो 7 ही मिली मगर ट्रेफ़िक कमाल का रहा... ग्राफ़ 80 को छू गया. समीर जी ने ग्राफ़ देख कर चुटकी भी ली कि अब से मैं सिर्फ़ चुटकले ही लिखा करूं.

इसके बाद हमने दूसरे ब्लाग छानने की ठानी कि कौन कौन क्या क्या लिख रहा है और उनको कौन कौन पढ और टिप्पणी दे रहा है. इसी कडी में एक ही मिलते जुलते शीर्षक पर दो पोस्ट मिली... एक ओरिजनल जिस पर 47 टिप्पणियां थी और बहुत सी टिप्पणियों को हटा दिया गया था. दूसरी पोस्ट उसी पोस्ट पर आधारित थी.. शीर्षक रूप से मगर बहुत कुछ और पढने के बाद ओरिजनल पोस्ट का संकेत दिया गया था.

आप कहेंगे कि इतनी राम कहानी क्यों सुनाई जा रही है तो आईये अब इससे जो निष्कर्ष निकले उन पर भी कुछ रोशनी डाली जाये कि टिप्पणियों और ट्रफ़िक के लिये क्या किया जाये.

१. कम से कम शब्दों में लिखी सार गर्भित रचना को ही पाठक पढ और पचा पाते हैं और यदि वह लीक से हट कर हुई तो उस पर टिप्पणी भी टिपा देते हैं.

२. ले दे के काम चलाओ... मतलब.. मतलब तो साफ़ हो टिप्पणियां करो और टिप्पणियां पाओ.

३. कोई कन्ट्रोवर्शिल पोस्ट डालो और पाओ टिप्पणियां और ट्रेफ़िक बल्ले बल्ले

४. गंभीर कि जगह कोई लाईट पोस्ट जो कुछ टेन्शन कम कर हंसा सके जैसे चुटकला. कार्टून आदि.. अगर बासी न हुआ तो कुछ कमाल कर सकता है.

५. कुछ ऐसा जो सिर्फ़ बुद्धिजीवियों की समझ में आये और टिप्पणियां पढ कर दूसरे भी टिप्पणी करने पर बाध्य हो जायें

६. टिप्पणी के लिये तो नहीं मगर ट्रेफ़िक के लिये एक कारगर उपाय है... कोई भडकीला, रंगीला, चटकीला.. धांसू जैसा कि हिन्दी समाचारों के शीर्षक होते हैं.. अपनी पोस्ट के लिये शीर्षक दीजिये और.. लोग दनादन आपके ब्लाग पर नजर आयेंगे.

यदि आप इसे पढते हैं और इस पर अमल करते हैं तो यह एक गंभीर पोस्ट है.. यदि आप इसे पढ कर इस पर अपनी पोस्ट के बारे में लिखने पर नाराजगी जाहिर करते हैं तो यह एक कंट्रोवर्शिल पोस्ट है.. अगर आपको इसे पढ कर हंसी आती है तो यह एक लाईट पोस्ट है.. और हां धांसू शीर्षक तो मैं इसे दे ही रहा हूं... हर हाल में मेरा ही फ़ायदा है... टिप्पणी न सही..ट्रेफ़िक तो आने ही वाला है.

एक चुटकले का कमाल ग्राफ़ की जुबानी