ओस मेँ भीगी औरत

वंदना जी की एक कविता से प्रेरित रचना 

ओस में भीगी औरत
पूर्ण औरत नहीं होती
धवल चपल
नवयौवना की तरुणाई
औस की बूंदों को
यौवन के ताप से
वाष्पित कर
एक कोहरे की चादर
तान देती है
जिसमें अलसाया यौवन
सावन की फ़ुहारों को तरसता
किसी मनचाही छुवन को प्रतीक्षारत
अंधेरों से निकल
रोशनी में नहा
हवा में ठहरी बूंदों से परावर्तित हो
इन्द्रधनुष हो जाना चाहता है
औस तो पहले पहर की चाह्त है
सूरज की किरणों के साथ ही मिट जायेगी
और इसे तो भीग कर
बरसों तक महकना है.

मोहिंदर कुमार  



2 comments:

Neeraj Neer said...

बहुत सुन्दर

संध्या शर्मा said...

बहुत सुन्दर रचना …