आदमी, सडक और आसमान


ननकू से छीन लिया
उसका सब कुछ
इस तारकोल से रंगी
काली कलूटी सडक ने
जिस पर गुजरते हुये
किसी संवेदन हीन वाहन ने
कुचल डाली उसकी दोनो टांगें
और फ़िर मुड कर भी न देखा
अब ननकू का जीवन मात्र रह गया है
चालीस पचास गज की सडक का फ़ेरा
चार पहिये लगे तख्ते पर बैठ
लालबत्ती पर खिसकते हुये
आते जाते वाहन चालकों के आगे
हाथ फ़ैलाना
गाली खाना
"मरने के लिये मेरी गाडी ही मिली है"
"अरे तू तो मरे बराबर है, औरों का ख्याल कर"

कोई कोई रूपया, दो रुपया टिका देता है
दूसरे दिन मांगने पर नजरें घुमा लेता है
आसमान भी ननकू का अपना नहीं हुआ
आये दिन चिलचिलाती धूप से तपती सडक
सरकने में सहारा देने वाली
हथेलियों को जला देती है
बे-मौसमी बरसात
उस दिन की शाम का चुल्हा बुझा देती है

उसका आसमान है अब
इस महानगर के एक बडे पुल के नीचे
प्लास्टिक की तरपाल का एक टुकडा
जो कहने को तो छत है
किन्तु स्वंय में बेबस है
आंधी-तुफ़ान-बारिश
रोक नही पाता है
ननकू रात में लेटे लेटे
अक्सर सोचता है
काश वो गाडी उसके पांव के ऊपर से नहीं
उसके सिर के ऊपर से गुजरी होती
शायद फ़िर उसे
न इस सडक
न इस आसमान
और न किसी आदमी से
कोई भी शिकायत होती

4 comments:

अनिल कान्त : said...

बेहद मर्मस्पर्शी ...जिंदगी की एक कड़वी सच्चाई है ये भी

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

ajay kumar jha said...

nanku ke bahane na jane kitno kaa dard ubhaar diya aapne, bahut hee marmsparshee lekhan kiya hai aapne.

संगीता पुरी said...

काश वो गाडी उसके पैरों से नहीं ... सर से गुजरी होती ... छू लेनेवाला भाव ... सुंदर अभिव्‍यक्ति।

नीरज गोस्वामी said...

मार्मिक रचना...
नीरज