वादा तेरा वादा



"वादा" एक ऐसा लफ़्ज जिसके बूते कोई तो जिन्दगी गुजारने के लिये तैयार है.. और कोई पूरा न होने पर गर्दन तक दबाने को तैयार हो जाये. अक्सर आपने लोगों को कहते सुना होगा..."वादे तो तोडने के लिये ही किये जाते हैं"... जाने कैसे पत्थर दिल लोग होते हैं ऐसा कहने वाले.

हमने भी नये साल में एक वादा किया था कि हफ़्ते में दो पोस्ट जरूर लिखेंगे सो दूसरी पोस्ट वादे पर ही ठेल रहे हैं.

गालिब साहिव का एक मशहूर शेर है

"तेरे वादे पर जिये हम, तो यह जान, झूठ जाना,
कि ख़ुशी से मर ना जाते, अगर एतबार होता"



वे कहते हैं, " तेरे वादे पर जो हम जीते रहे तो समझ कि मैंने उसे झूठा ही समझा था । अगर तेरे वादे पर विश्वास होता तो मारे ख़ुशी के मर न जाते ।" माशूक़ के वादे पर क्या तीखा व्यंग्य है..

और अगर आपको अपना वादा पूरा न करना हो और बुरा भी न बनना हो तो कुछ इस तरह की चालाकी से काम चलाना पडेगा कि सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे

"मरीजे-ईश्क से कर गये वो वादा पांचवें दिन का
किसी से सुन लिया होगा कि दुनिया चार दिन की है"


"जिन्दगी" से भी अक्सर कोई न कोई शिकायत रह ही जाती है... महावीर शर्मा जी के शब्दों में

"ज़िन्दगी ने प्यार का वादा निभाया ही कहाँ है
नाम लेकर प्यार से मुझ को बुलाया ही कहाँ है"


और जब महबूब एक नजम के रूप में हो तो गुलजार साहिब फ़र्माते हैं

"मुझसे इक नज़्म का वादा है, मिलेगी मुझको
डूबती नब्ज़ों में, जब दर्द को नींद आने लगे"


कभी कभी हदों से गुजर कर आदमी खुद को आजमाना चाहता है..  इकबाल जी के लफ़्जो में


"तेरे इश्क़ की इन्तहा चाहता हूँ
मेरी सादगी देख क्या चाहता हूँ
सितम हो कि हो वादा-ए-बेहिजाबी
कोई बात सब्र-आज़मा चाहता हूँ"



दाग देहलवी तो वादे को सच मान कर रात भर इन्तजार करते रहे...  शुक्र है .. इन्तजार रात भर का था जिन्दगी भर का नहीं.  अब यह भी पता नहीं चल पा रहा कि वो आने वाले को कयामत का दर्जा क्यों दिया जा रहा है.

"ग़ज़ब किया,  तेरे वादे पे ऐतबार किया
तमाम रात क़यामत का इन्तज़ार किया"




और कुछ अन्दाज यह भी हैं ...



"दिल्लगी थी उसे हम से मुहब्बत कब थी
महफ़िल-ए-गैर से उन को फ़ुर्सत कब थी
हम थे मुहब्बत में लुट जाने के काबिल
उसके वादों में वो हकीकत कब थी"


"राह मुश्किल है मगर दिल को आमदा तो करो
साथ चलने का मेरे तुम इक बार इरादा तो करो
दिल बहल जाता है मेरा दोस्त तेरे वादों से
वादा वफ़ा ना  करो, मगर एक बार वादा तो करो"


"बहुत कुछ है पास लेकिन कुछ भी न रहा
उसकी ही जुस्तजू थी   और वो ही न रहा
कहता था कि इक पल न रहेंगे तेरे वगैर
हम दोनो रह गये बस वो वादा ही न रहा"

मुहब्बत के किसी ऐसे ही अन्दाज के साथ मैं फ़िर आपके सामने आऊंगा.. तब तक के लिये विदा.

7 comments:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

वादे पे बड़े बड़े मारे गये, फिर चाहे आप हों या कोई और।
वैसे भाव बहुत सुंदर हैं।
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बारिश की वो सोंधी खुश्बू क्या कहती है?
क्या सुरक्षा के लिए इज्जत को तार तार करना जरूरी है?

Rajey Sha said...

मैंने भी खुद से कोई वादा सा कि‍या था कभी

अब कभी जि‍न्‍दगी में कोई वादा नहीं करना है

राज भाटिय़ा said...

अजी वादे तो इस सराकार ने , मन मोहन जी ने भी किये थे

हरकीरत ' हीर' said...

वाह...वाह....महेंदर जी मज़ा आ गया .....हम दोनों तो रहे पर वादा न रहा .....ओह .....संग्रह कर रखने लायक ......कहाँ थे इतने दिन ......??.

vibha rani Shrivastava said...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 11 फरवरी 2017 को लिंक की जाएगी ....
http://halchalwith5links.blogspot.in
पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

सुशील कुमार जोशी said...

वाह।

savan kumar said...

अपनी कविता की दो लाईन या द आ गई
एक वादे के लिए एक वादा तो करों
छुठा ही सहीं पक्का इलादा तो करों
अच्छा लिखा आपने
http://savanxxx.blogspot.in