मेरे उदास दिल में आज़ भी तू है
इक गुलाब की तरह्
बेमाना से टूटे हुये पैमाने में
बू-ए-शराब की तरह्
तूने ही बाहर से मज़मून पढ लिया
वरना बरसों से मैं रहा हूं
इक बंद किताब की तरह्

4 comments:

Pratik said...

बहुत खूब!!!

Jitendra Chaudhary said...

वाह! मोहिन्दर भाई,
मजा आ गया। बहुत अच्छा लिखा है।

miredmirage said...

Nice.
ghughutibasuti

राकेश खंडेलवाल said...

ज़िल्दों से जो झलका, वही मजमून था मुआ
जाहिर वो कर गया मेरा पूरा ही मजमुआ
शाया न लब करें मगर जो चश्मे तर कहें
उसको कभी समेट लें, साहस नहीं हुआ