दौरे-मुक्कदर

सदियोँ से आँख का दिल से गहरा रिश्ता है
मेरी चश्मेनम है तो वो भी बहुत रोया होगा
आती नहीँ है नीँद अगर आज मेरी आँखोँ मेँ
वो भी सुकून से कई रातोँ से न सोया होगा

वादिये दिल मेँ मेरे दर्द की बारिश है अभी
उसके जहन में भी इक कोहरा सा छाया होगा
जब मेरे दिल पर देगा वो नर्म हाथों से दस्तक
अर्श पर यकीनन पूरा चाँद निकल आया होगा

मेरे दिल में बसी है अगर उनकी ही तस्वीर
उसने भी दिल को मेरे तसब्बुर से सजाया होगा
भला दूरियाँ प्यार को क्योँकर कम कर पाती
हर कदम मेरी जानिब उठा चला आया होगा

खूशबू जिसकी अभी तक है उनके सिरहाने में
मेरा वो खत किस तरह उसने जलाया होगा
आसान नहीँ तहरीरे मुहब्बत मिटाना दिल से
देख कर मुझ को हर लफ़ज़ उभर आया होगा

कौन चाहता है खुद अपनो से यूं जुदा होना
दौरे-मुक्कदर से ही राह में ऐसा मौड आया होगा
फिर मिल जायेंगे यूंही राहों में चलते चलते
गर खुदा ने तुझे सिर्फ़ मेरे लिये बनाया होगा

5 comments:

sunita_singh21 said...

bahut khoob likha hain aapne mohinder aise lagta hain ki aap ka kalam nahin dil likh raha ho ........

Reetesh Gupta said...

कौन चाहता है खुद अपनो से यूं जुदा होना
दौरे-मुक्कदर से ही राह में ऐसा मौड आया होगा
फिर मिल जायेंगे यूंही राहों में चलते चलते
गर खुदा ने तुझे सिर्फ़ मेरे लिये बनाया होगा

बढ़िया लिखा है ...बधाई

Udan Tashtari said...

बहुत बेहतरीन कलम चली है भावों को उकेरने के लिये. बधाई. लिखते रहें.

रंजू said...

wah bahut khoob ji

मेरे दिल में बसी है अगर उनकी ही तस्वीर
उसने भी दिल को मेरे तसब्बुर से सजाया होगा
भला दूरियाँ प्यार को क्योँकर कम कर पाती
हर कदम मेरी जानिब उठा चला आया होगा

kya baat hai ...

महावीर said...

निहायत ही खूबसूरत कलाम है मोहिन्दर भाई! ये अशा'र बहुत पसंद आएः
'खूशबू जिसकी अभी तक है उनके सिरहाने में
मेरा वो खत किस तरह उसने जलाया होगा
आसान नहीँ तहरीरे मुहब्बत मिटाना दिल से
देख कर मुझ को हर लफ़ज़ उभर आया होगा'

यही कहूंगाः
अलफ़ाज़ हम ढूंढें कहां, तबिसरा कैसे करें
जब ग़ज़ल पढ़ने लगे, चश्म नम तर हो गए।

आपकी साइट पर आज पहली बार ही आया हूं, बस आपकी अगली पिछली रचनाओं ने अटका दिया। 'किसी रोज जब सो कर न उठूंगा' को तो तीन बार पढ़ डाली।