व्हू मूवड माई चीज - स्पेन्सर जोहन्सन, एम.डी.

मेरा पनीर किसने चुराया

व्हू मूवड माई चीज (Who Moved My Cheese ? written by Spencer Johnson) 95 पेज की किताब है जिसे मैंने हाल ही में पढा और मुझे लगा कि इसके बारे में मैं आप सब को भी बताऊं. यह किताब हमें बताती है कि जीवन में होने वाले परिवर्तनों से हमें किस तरह से निपटना चाहिये.

इस किताब की शुरूआत में कुछ मित्रों के मिलन का जिक्र है जो स्कूल के समय से एक दूसरे को जानते हैं और इसलिये आपस में मिलते है कि जान सकें सब वैसा ही चल रहा है जैसा उन्होंने अनुमान लगाया था या फ़िर जीवन में कुछ बदलाव है. सब मिल कर अपना अपना मत रखते हैं और फ़िर एक दोस्त एक कहानी सुनाता है जिसने उसके जीवन में व सोचने की दिशा में परिवर्तन कर दिया.

इस कहानी में सिर्फ़ चार चरित्र हैं दो चूहे "सनिफ़" और "सक्करी" एंव "हेम्म" और "हा" जिन्हें रचनाकार "लिटलपीपल" कह कर भी बुलाता है. उन चारों का आकार बहुत छोटा है और जिनकी गतिविधियों को तभी देखा जा सकता है जब उन पर बहुत ध्यान दिया जाये. सनिफ़ और सक्करी सामान्य बुद्धि के मालिक हैं मगर उनमें आन्तरिक विश्लेष्ण की अद्धभुत शक्ति है. वह किसी भी घटना की ज्यादा तह में जाना पसन्द नहीं करते. वहीं हेम्म और हा बुद्धिमान है, भावनाओं से ओतप्रोत हैं.

यह चारों एक "Maze" (एक ऐसा स्थान जिसमें संकरें रास्ते हैं, झाडियां हैं, अन्धकार है, खतरा है साथ ही साथ जीवन यापन के लिये काफ़ी कुछ है)

सनिफ़ और सक्करी की खोज का तरीका है " जांच-गलती-जुगाड". वो संकरे रास्तो से जाते, कुछ न मिलने पर लौट आते और फ़िर उस रास्ते को याद रख कर दूसरे रास्ते पर खोज के लिये निकल पडते. जबकि हेम्म और हा अपने दिमाग पर ज्यादा निर्भर रहते, अपने भूतकाल के अनुभवों का प्रयोग करते और जटिल क्रियाओं का प्रयोग करने में विश्वास करते थे.

इस कहानी में यह चारों "Cheese" पनीर की तलाश में हैं. ढूंढते ढूढते यह चारों एक ऐसे स्थान पर पहुंच जाते हैं जहां काफ़ी मात्रा में पनीर है. सनिफ़ और सक्करी दोनो सुबह सुवह उठ कर जल्दी उस जगह पहुंच जाते, उस जगह का ध्यान से निरीक्षण करते और फ़िर अपने खाने पीने में जुट जाते.
दूसरी और हेम्म और हा आराम से उठते, तैयार होते और उस जगह पहुंचते आराम से बिना कुछ देखे भाले वो अपना खाना पीना शुरू करते और शाम को चारों घर लौट आते.

हेम्म और हा को अपनी सफ़लता से इतना घमण्ड हो गया कि वो समझने लगे की इस पनीर पर उनका पूरा अधिकार है और उन्हे अपना भविष्य नितांत सुरक्षित लगने लगा. उन्हे इस बात की परवाह भी न रही कि उनके आस पास क्या हो रहा है. इसी तरह कई दिन तक चलता रहा.

एक दिन जब चारों पनीर वाली जगह पहुंचे तो पनीर वहां नही था... चारों हैरान थे कि क्या हुआ. दोनों चूहों सनिफ़ और सक्करी ने तो ज्यादा परवाह नहीं की और दोनों दूसरी जगह की खोज में निकल पडे मगर हेम्म और हा दोनों सकते में थे कि क्या हो गया. सच पूछें तो उन्होंने इस बात पर ध्यान ही नही दिया था कि धीरे धीरे पनीर खत्म हो रहा था. क्योकि पनीर उनके लिये महत्वपूर्ण था वो दोनों बहुत देर तक विचार करते रहे कि क्या करना है. उन दोनों को पनीर पर टिके अपने भविष्य के सपने धराशायी होते दिखने लगे. उन्हे लगा किसी ने उनका सब कुछ छीन लिया है और उनके साथ बहुत बडा अन्याय किया गया है. वो उस रात घर जा कर भूखे पेट ही सो गये. जाने से पहले "हा" ने दिवार पर लिख दिया "पनीर तुम्हारे लिये जितना महत्वपूर्ण होगा तुम उस पर उतना ज्यादा अधिकार रखना चाहोगे".

हेम्म और हा दूसरे दिन फ़िर वहीं पहुंचे.. मगर न कुछ बदलना था और ना ही बदला था.. वहां पनीर नहीं था.. सनिफ़ और सक्करी वहां नहीं थे वो तो पहले ही दूसरी जगह पनीर की तलाश में निकल गये थे. हा ने हेम्म से कहा हम भी कहीं और जा कर पनीर तलाश करते हैं मगर हेम्म सुनने को तैयार ही नही था. हेम्म और हा कुछ दिन तक लगातार वहां आते, स्थान का मुआयना करते, स्थिति की गंभीरता पर चर्चा करते और रात को घर लौट कर भूखे पेट सो जाते... सोना क्या अब तो नींद आनी भी बन्द हो गयी थी. एक दिन तो औजार ले कर दीवार में छेद भी कर के देख लिया मगर पनीर नहीं मिला... मिलता भी कहां से वहां होता तो मिलता.

कई बार हा ने हेम्म को छोड कर दूसरी जगह खोज पर जाने की सोची मगर हर बार उस का डर कि बाहर वो खो सकता है, राहें अन्जान हैं, अन्धेरा और खतरा बहुत है उसे रोक लेता. दोनो कमजोर भी हो गये थे. उधर सनिफ़ और सक्करी ने पनीर के एक और भंडार का पता लगा लिया था और दोनों मौज कर रहे थे.

हा ने हेम्म से फ़िर दूसरी जगह चल कर पनीर ढूंढने की बात कही मगर हेम्म कहने लगा, कहां जाओगे, क्या जरूरी है कि पनीर मिल ही जाये और अगर नही मिलेगा तो क्या करोगे, फ़िर बाहर खतरा भी कितना है. हा ने समझाने की कोशिश की मगर हेम्म को गुस्सा आ गया. हा ने जाने से पहले दीवार पर लिखा "अगर तुम नहीं बदलते तो तुम्हारे समाप्त होने की आशंका है"

बाहर जाने से पहले हा ने मुड कर देखा और अपने आप से एक प्रश्न किया "अगर तुम्हें कोई डर न होता तो तुम क्या करते ?. उसे तुरन्त उत्तर भी मिल गया... जितनी जल्दी हो निकल लो...

अगले कुछ दिनों तक हा इधर उधर पनीर की तलाश में भटकता रहा, उसे यहां वहां कुछ टुकडे मिले भी मगर वो काफ़ी नहीं थे. जब भी वो निराश होने लगता .. खुद को तसल्ली देता... वो धीरे धीरे स्थिति पर काबू पाने लगा था. उसे लगा कि अगर सनिफ़ और सक्करी दूसरी जगह जा सकते हैं तो वह क्यों नही जा सकता. उसे लगने लगा कि परिवर्तन ही उसके लिये सब से आवश्यक है और उसे यह परिवर्तन स्वंय ही लाना होगा एवं उसके अनुसार उसे ढलना होगा तभी जीवन चल पायेगा. हा सोचने लगा कि शायद पहले वाला पनीर गायब नही हुआ परन्तु समाप्त हो गया था और शायद कुछ खराब भी हो गया था क्योंकि पुराना था. उसने रूक कर एक जगह लिखा " पनीर को समय समय पर सूंघते रहो जब यह पुराना होने लगे"

हा की कोशिश जारी थी उसे कभी कभी लगने लगता कि उसे पनीर का बडा भंडार मिलने वाला है परन्तु ऐसा कुछ सचमुच में नही हो पा रहा था. हा को अपने दोस्त हेम्म की याद आती थी.. कई बार उसे लगता कि वह फ़िर हेम्म के पास लौट जाये परन्तु दूसरे ही क्षण वह स्वयं पर काबू पा लेता.

चलते चलते एक दिन हा को एक अन्धेरा तंग रास्ता दिखा.. सब तरह के विचार उसके मन में आ रहे थे इस राह पर जाऊं कि नहीं, आगे क्या है ? कोई खतरा तो नही ? फ़िर उसे लगा कि डर शायद स्थिति का सही मुल्यांकन नही करने दे रहा... उसने उस रास्ते पर दौडना शुरू कर दिया. जैसे जैसे वह आगे बढता जाता था उसकी खुशी बढती जाती थी.. उसे समझ नही आ रहा था कि उसे किस बात की खुशी है क्योंकि पनीर तो अभी मिला नहीं है... उसने रुक कर एक जगह लिखा "जब हम डर पर काबू पा लेते हैं तो स्वतंत्रता का एहसास होता है" हा को लग रहा था कि वह इतने दिनो तक अपने डर की कैद में था. तभी उसे पनीर का एक छोटा भंडार मिला... उसे लगा अगर वह यहां पहली आ जाता तो शायद यहां पर ज्यादा पनीर होता. उसे लगा वो जा कर अपने दोस्त हेम्म को अपने साथ ले ले. उसने अपने साथ कुछ पनीर के टुकडे लिये और हेम्म के पास लौट आया और उसे पनीर देना चाहा परन्तु हेम्म ने उसे स्वीकार नहीं किया. हेम्म बोला उसे यह पनीर नहीं अपना पहले वाला पनीर ही चाहिये... जो उसका था. हा ने जाने से पहले लिखा "जितनी जल्दी आप पुराने पनीर का लोभ छोडेंगे उतनी जल्दी आपको नया पनीर मिलेगा. बाहर निकल कर खतरा मोल लेना अधिक सही है बनिसपत इसके कि तुम बिना पनीर वाली जगह रहो".

हा फ़िर से अपनी तलाश में निकल पडा क्योंकि उसे लगा हेम्म उसकी बात नही समझ पा रहा. उसके रास्ते और दिशा पनीर की तलाश में बदलती रही. उसे लगा वो सही दिशा में आगे बढ रहा है. उसे यह भी लगा कि शायद एक दिन उसका दोस्त हेम्म उसको तलाश करता हुआ उसके पीछे आये. हेम्म की सुविधा के लिये उसने रुक कर एक जगह लिखा "छोटे छोटे परिवर्तनों को अगर समय से चिन्हित कर लिया जाये तो आगे आने वाले बडे परिवर्तन से असुविधा नहीं होगी".

आखिर खोजते खोजते हा एक दिन उस जगह पहुंच गया जहां पनीर का बहुत बडा भंडार था और उसके साथी सनिफ़ और सक्करी पहले से ही मौजूद थे. उन दोनों ने हा का स्वागत किया.
हा को खुशी थी कि उसने अपने डर पर काबू पा कर आखिर अपनी मंजिल पा ली है.
उसे लगा जब कोई अपने ऊपर हंसना सीख जाता है तो जीवन आसान हो जाता है. जीवन में गहन विश्लेषण दुखदायी हो सकता है. खोये हुये पनीर को पाने का एक ही रास्ता है कि तुम भी अपना स्थान बदलो. आपके प्रयास सादे, लचकदार व तुरन्त होने चाहिये. परिवर्तन का सबसे बडा रोधक हमारे भीतर ही है. साथ ही उसने ये फ़ैसला किया कि बाहरी दुनिया में पनीर हमेशा रहता है चाहे आप माने या ना माने. जीवन में ज्यादातर डर बेमानी होते हैं और आपकी उन्नति के प्रवाह को रोकते हैं.

हा को हेम्म की याद सताने लगी. उसे लगा काश हेम्म भी मेरे साथ आता.. फ़िर उसे लगा उसने तो अपनी कोशिश कर के देख ली थी. हा को लगा अगर हेम्म उसके लिखे हुये वाक्य अगर पढ लेगा तो उसे यहां तक आने में कोई कठिनायी नहीं होगी.

तभी हा ने बाहर किसी के आने की आवाज सुनी.. हा प्रार्थना करने लगा.... काश आने वाला उसका दोस्त हेम्म ही हो.

नोट: इसे किताव का अक्षरश: रूपान्तर न समझा जाये.






5 comments:

Raviratlami said...

यह किताब सचमुच में कठिन परिस्थितियों से संघर्ष करते रहने की प्रेरणा मनुष्य को देती है.

Udan Tashtari said...

हमारी भी पसंदीदा किताबों की श्रेणी में यह किताब है, मुझे बहुत पसंद है. आपने हिन्दी में अच्छा विश्लेषण किया.

Divine India said...

प्रेरक पुस्तकें व्यक्तित्व को निखारती हैं…लेकिन हमारे साथ जो सबसे बड़ी समस्या वह है न ज्यादा पढ़ने की,आज तो हालात हैं यह हैं की लोगों ने अच्छी पुस्तकों को देखा ही नहीं है…।
बहुत अच्छी समीक्षा की आपने…पढ़कर अच्छा लगा।

नितिन बागला said...

बेहतरीन तरीके से आपने किताब के चुनिंदा अंश सामने रखे हैं..
जिन्दगी में निर्णय लेना और परिवर्तनशील होने के महत्व को बेहद सही अंदाज में बताया है
धन्यवाद

Anonymous said...

this is writen extremly well
i realy got great knowledge and inspiration through ths writing
keep writing like this
GOD BLESS