लम्पट मन

आपने अवश्य पढा होगा "मन चंचल, मन बांबरा.........मन की मती चलिये नही....पलक पलक मन और" इसी आशय को ले कर मैंने कुछ पंक्तियां लिखी हैं जो मन की अवस्था को दर्शाती हैं...हताशा के समय एवम् सामान्य अवस्था में भी... कारण कुछ भी हो... मन पर काठी कसना बेहद कठिन कार्य है...जिसने यह कर लिया... उसे मेरा दण्डवत् प्रणाम.


मन की भाषा सरल नहीं है
इसकी व्याख्या हो न पाये
कालान्तर के चिन्तन क्या-क्या
वर्तमान के विफल पर्याय

तुलनाओं के हाट पर
सतत, अनवरत प्रयास
जब धूलधुसरित हो जाते हैं
धर्मसंगत, विधिसम्मत राहों के दीपस्तम्भ
अंधकारमय हो जाते है

शाम, दाम, दण्ड, भेद भी
चंचल, चपल मन पर न पा पायें पार
कनक, माणिक या मांसल देह देखी नहीं
यह लोभी टपकाये लार

कामनाओं के क्षुधित तरक्षु
लम्पट मन पर हावी हैं
शुष्क काष्ठ सी निर्जीव चेतना
व्यवहृत अश्व सी धावी है

क्या करना है सुनहरी अक्षर वाच के बरसों
यदि एक दीप जला न पाये
कस्तुरी मृग बन भटके घट घट
किन्तु सुगन्ध तक पहुंच न पाये

2 comments:

Mired Mirage said...

सही कह रहे हैं । जो मन को थोड़ा सा वश में कर ले बस उचित अनुचित जानने भर को, उसने दिग्विजय कर ली ।
घुघूती बासूती

भोजवानी said...

लंपट मन
....बड़ा गजब क शीरषक हउवै। बहुत खूब