तरकश का एक और तीर

तरकश स्वर्ण कलम प्रतियोगिता को तो सब लोग अब तक भूल ही चुके होंगे, सिवा मेरे. ट्राफ़ी और प्रशस्ति पत्र की लम्बी प्रतीक्षा के बाद जब हम भूलने लगे थे कि हमने किसी ऐसी प्रतियोगिता में भाग लिया था... तभी तरकश डाट काम का एक लिफ़ाफ़ा मिला.. खोला तो प्रशस्ति पत्र था परन्तु मोहिन्दर कुमार की जगह मोहिन्दर सिंह छपा था. मजे की बात यह है कि एक महीना पूर्व मेरे आग्रह पर मेल द्वारा जो प्रशस्ति पत्र स्केन कर के मुझे भेजा गया था उसमे मेरा नाम सही दर्ज था परन्तु जब असली प्रशस्ति पत्र प्राप्त हुआ तो मोहिन्दर सिहं का नाम अंकित था.

अभी तो सिर्फ़ दो ही प्रशस्ति पत्र थे अगर ज्यादा होते तो पता नहीं क्या हो जाता. ट्राफ़ी का तो अभी दूर दूर तक नामो निशान नहीं है ना ही इस बारे में कोई सूचना ही दी गई है. इस प्रकरण से पता चलता है कि आयोजकों ने कितनी गंभीरता से इस प्रतियोगिता का अयोजन किया है.

इस तरह हुआ तरकश का एक और तीर दिल के आर पार.

2 comments:

Pankaj Bengani said...

श्री मोहिन्दर कुमार,

स्विकार करता हुँ कि तरकश नेटवर्क माइक्रोसॉफ्ट जितना "प्रोफेशनल" नहीं है. (इसका अर्थ आप रवि रतलामी से जान लेवें - यदि ईच्छा हो तो).

जब आप हर बात का खुलासा तरकश से ईमेल द्वारा माँगने की बजाए ब्लोग पर लिखना पसंद करते हैं, तो तरकश की तरफ मैं आपसे सार्वजनिक रूप से माँफी भी मांग लेता हुँ. क्षमा करें.

आपका "सुधारा हुआ प्रशस्ति पत्र" और "ट्रोफी" आपको शिघ्र मिल जाए इसके लिए हम हर सम्भव प्रयास करेंगे.

"काफी मेहनत" के बाद जीत दर्ज करने वाले एक "उत्कृष्ट कवि" की कद्र होनी ही चाहिए.

सुनीता शानू said...

नाम की गलती तो हो ही जाती है...इसमें परेशान होने की कोई बात नही...आपको ट्रोफ़ी मिली या नही...प्रशस्ति पत्र मि्ला कि नही यह बात कोई नही जानता...और यह भी सच है कि यह सब नेट की प्रतियोगितायें है ज्यादा परेशान होकर न लें...जीत का प्रचार तो आपका हो ही चुका है विजेता आप ही हैं...