दलदल

कांपते लबों पर
इक दास्तान
अनकही
रही
देर तक
इस आस में
कि तुम्हारा
रुख हो
इस तरफ़
और जब
तुम न मुडे
ढल कर
एक बूंद में
पलक से
ढलक पडी
अब कभी
इधर से न गुजरना
शेष कुछ नहीं
न दास्तान
न आस
न आंसू
बस दलदल है

4 comments:

शोभा said...

मोहिन्दर जी
मुझे यह कविता बहुत अच्छी लगी। इसमें दिल की बात बहुत सुन्दर रूप में सामने आई है। बहुत-बहुत बधाई।

रंजना [रंजू भाटिया] said...

दिल की बात दिल से लिख दी है आपने बहुत सुंदर लगी यह रचना

राजीव रंजन प्रसाद said...

गहरी रचना..दिल को छूती हुई..

Udan Tashtari said...

दिल की गहराईयों में उतरी गई आपकी बात. बहुत सुन्दर.