तुम मुझे आवाज देना

जब लगे कुछ छूटता सा
भीतर कुछ टूटता सा
तोड ताले लबों के
तुम मुझे आवाज देना

जब भी भारी हो मन
और हों बोझिल नयन
सब कुछ भुला के
तुम मुझे आवाज देना

चांदनी जब जलाये
और जब यादें सताये
एक साया समझ कर
तुम मुझे आवाज देना

हो राह अन्जान कोई
और आये तूफ़ान कोई
दीवारें सारी गिरा कर
तुम मुझे आवाज देना


खुश हो तुम तो ही खुशी है
प्यार की यह जादूगिरी है
भूल बैठा हूं सब कुछ
क्या अजब जिन्दगी है
हो कोई भी जरूरत
अपने कल को भुला कर
लौट आना कभी भी
और ये न समझना
कि मेरा कोई नही है

जो था कभी साथ गाया
वही गीत गुनगुना के
तुम मुझे आवाज देना

6 comments:

seema gupta said...

जब लगे कुछ छूटता सा
भीतर कुछ टूटता सा
तोड ताले लबों के
तुम मुझे आवाज देना
" खुबसुरत एहसासों से सजी एक सुंदर रचना, ये शब्द कुछ खास लगे.."

regards

Amit said...

खुबसूरत रचना ..काफ़ी अच्छा लगा पढ़ कर

विनय said...

बहुत ही बढ़िया

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http://prajapativinay.blogspot.com/

रंजना said...

वाह ! अभूतपूर्व भावः विन्यास है.ह्रदय के भाव शब्दों में ढलकर हृदयहारी हो गए हैं.
बहुत बहुत बहुत ही सुंदर....
साधुवाद.

Mired Mirage said...

बहुत सुन्दर ।
घुघूती बासूती

सुनीता शानू said...

जब लगे कुछ छूटता सा
भीतर कुछ टूटता सा
तोड ताले लबों के
तुम मुझे आवाज देना
इन पंक्तियों ने बाँध लिया...बहुत सुन्दर रचना.