प्यार का रंग न बदला

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युग बीते
क्या क्या न बदला
मगर प्यार का रंग न बदला

जब भी फ़ूटा
दिल में नेह का अंकुर
नैनों की भाषा बदली है
पहरों की छांव में
मिलने का ढंग बदला है
मगर प्यार का रंग न बदला

इतिहास साक्षी है
राज मिटे हैं
ताज झुके हैं
दुनिया नें नाता तोडा है
अपनों की आंखे बदली हैं
मगर प्यार का रंग न बदला

प्राण मूल से
चुभन शूल से
किस तरह अलग हो
प्यार बिना जीवन बंजर
बिना धार ज्यूं हो खंजर
मान्यताओं के मौसम बदले हैं
मगर प्यार का रंग न बदला

जहां कहीं है
ऊंच नीच का संगम
और नजर आ जाये
रेशम में टाट का पैबंद
समझो नेह निवास वहीं है
भीतर बाहर के प्रसंग हैं बदले
मगर प्यार का रंग न बदला

युग बीते
क्या क्या न बदला
मगर प्यार का रंग न बदला

2 comments:

शोभा said...

वाह क्या बात है। बहुत अच्छा लिखा है।

Vijay Kumar Sappatti said...

mohinder ji ;

युग बीते
क्या क्या न बदला
मगर प्यार का रंग न बदला

aapne kitni khoobsurat baat likhi hai , wah ji wah , maza aa gaya , kavita ko padhkar ..

aapko dil se badhai ..

vijay