मत पूछिये मुझ से ठिकाना मेरा

जर्रा-ए-खाक हूं, हवा से परवाजें
मत पूछिये मुझ से ठिकाना मेरा

ओस भिगोये धूप जलाती बदन
न सिर्फ़ चमन, हर वीराना मेरा

न तो हस्ती. न कोई बस्ती मेरी
बस यह गुमान कि जमाना मेरा

तेरे किसी काबिल नहीं बजूद मेरा
फ़ासले तुझ से सिर्फ़ बहाना मेरा

कोई दहलीज नहीं किस्मत में मेरी
सफ़र की गर्दिशें है आशियाना मेरा

जर्रा-ए-खाक हूं, हवा से परवाजें
मत पूछिये मुझ से ठिकाना मेरा

5 comments:

अनिल कान्त : said...

waah ...bahut khoob ....mujhe bahut achchhi lagi

विनय said...

अच्छी रचना है

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तख़लीक़-ए-नज़रचाँद, बादल और शामगुलाबी कोंपलेंतकनीक दृष्टा

RAJNISH PARIHAR said...

बहुत ही उम्दा रचना है...!उर्दू का ज्यादा प्रयोग खटकता है..

Udan Tashtari said...

एक उम्दा रचना.

Mumukshh Ki Rachanain said...

सुन्दर भावाव्यक्ति.

अच्छी रचना.

बधाई.

चन्द्र मोहन गुप्त