सागर की पीडा


नदिया मिलती सागर में
दरिया गिरते सागर में
मैं जा कर किससे मिलूं
ये सोच के सागर रोता है
जो खारापन आप ने महसूस किया
वो उसके आंसूओं से होता है

मोहिन्दर

9 comments:

मुकेश कुमार तिवारी said...

मोहिन्दर जी,

एक नयी सोच लगती है सागर के खारेपन पर। बहुत ही थोड़े में बहुत कुछ कहती हुई पंक्तियाँ।

बधाईयाँ,

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

रंजना [रंजू भाटिया] said...

कम पंक्तियों में गहरी बात .सुन्दर

mehek said...

sach bahut hi sunder choti lines mein bahut gehri baat,badhai

संध्या said...

apnae main samatna valae rotae nahi..

शोभा said...

वाह ः)

महामंत्री - तस्लीम said...

अरे वाह, क्या बात है। सागर के दिल में भी दर्द हो सकता है, यह सोच पहली बार पढ रहा हूं। बधाई।

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TSALIIM.
-SBAI-

Vijay Kumar Sappatti said...

mohindar ji , aapki is rachna ne to aankhe nam kar diya ji

main ab kya kahun , nishabd hoon aur aapke shabdo ke dekh raha hoon ..
dil se badhai saheb..

vijay
http://poemsofvijay.blogspot.com

G M Rajesh said...

kharaa hai samandar aansuon se
khoob kahi ji

Harkirat Haqeer said...

जो खारापन आपने महसूस किया
वो उसके आंसुओं का होता है ...

वाह...वाह...वाह...बहुत खूब...जी.....!!