शेर जो गजल न बन सके - जिन्दगी

कुछ दूर यूंही चल कर अक्सर ठहर जाती है जिन्दगी
फ़िर हर इक याद  रुक रुक कर दोहराती है जिन्दगी
पहले तो ढूंढती है अपने यह लिये खुद इक मुकाम
और फ़िर खुद ही इक तलाश बन जाती है जिन्दगी

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कांच से रिश्ते संभालने में बिताई है जिन्दगी
फ़िर आज क्यूं हमसे हुई परायी है जिन्दगी
ख्वाबों के शहर छोड कर हम हैं दूर आ गये
हालात की आंधी में रेत  सी उडाई है जिन्दगी

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यूं जीने का नाम जिन्दगी है सोचा न था कभी
बस रोने का नाम जिन्दगी है सोचा न था कभी
वफ़ा के नाम पर वो सिर्फ़ इक दाग   दे गया
उदास सुबह शाम जिन्दगी है सोचा न था कभी

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हर पल कुछ नया रूप  दिखलाती है जिन्दगी
कभी धूप कभी चांदनी में चलाती है जिन्दगी
कभी मखमल बन तलबे सहलाती है जिन्दगी
कभी खार बन गहरे तक गढ जाती है जिन्दगी

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4 comments:

परमजीत बाली said...

सुन्दर मुक्तक हैं।बधाई।

वीनस केशरी said...

जिंदगी के कई रंग दिखा दिए आपने
सुन्दर

रंजना [रंजू भाटिया] said...

ज़िन्दगी के हर रंग को शमिल किया है आपने इस रचना में अच्छी लगी यह रचना शुक्रिया

anuradha srivastav said...

बहुत खूब लिखा हर पंक्ति दिल को छूती है ।शायद कहीं ना कहीं ज़िन्दगी को लेकर कुछ ऐसा ही नज़रिया हम सबका है।