मान से मनुहार से

नेह से, स्नेह से रिश्ते बंध जाते हैं

मान से, मनुहार से गये लौट आते हैं

इक घाव से क्यों टूटे डोर ये बरसों की

क्या अपने हाथों हम घाव नहीं खाते हैं

4 comments:

रश्मि प्रभा... said...

maan manuhaar iktarfa kyun
phir ek ghaaw ka intzaar kyun !!!

वन्दना said...

वाह क्या बात कही है……………सार्थक विचार्।

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

बहुत प्यारा मुक्तक

Kailash C Sharma said...

बहुत सार्थक सोच..