गर वक्त मेहरवान हुआ फ़िर कभी
यूंही तुझ से मिलेंगे चलते चलते
जिस तरह चांद से मिलता सूरज
यूंही हर रोज शाम को  ढलते ढलते

5 comments:

ehsas said...

very nice.

सदा said...

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द ।

Shah Nawaz said...

बढ़िया है!

Patali-The-Village said...

बहुत सुन्दर अभिब्यक्ति| धन्यवाद|

राज भाटिय़ा said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।