तेरी याद आ रही है



याद का क्या है
गाहे वगाहे चली आती है
सावन जब बरसता है
धूप जब गुनगुनाती है

न सुबह, न शाम से
इसका कोई वास्ता है
न दर,  न दीवार से
होकर इसका रास्ता है

ये बंद आंखो से भी
दिल में उतर जाती है
हो तन्हाई या  भीड
बहुत तडफ़ाती है

तुम चले आओ न कभी
इन्हीं यादों की तरह
बिन खबर दिये जैसे
ये अक्सर चली आती हैं.

1 comment:

Kailash C Sharma said...

तुम चले आओ न कभी
इन्हीं यादों की तरह
बिन खबर दिये जैसे
ये अक्सर चली आती हैं..

सच है यादों से छुटकारा कहाँ मिलता है..बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना..नव संवत्सर की हार्दिक शुभकामनायें!