चाणक्य और मां का आशीर्वाद





यह कहानी ईसा पूर्व लगभग ३५० वर्ष पहले की है. एक पन्द्रह वर्षीय बालक अपनी मां के पास बैठा हुआ था.  मां ने अपने एक मात्र लाडले पुत्र की और देख कर कहा, "बेटा हम बहुत गरीब हैं, तेरे पिता ने अत्यन्त गरीबी में रह कर अपने दिन काटे हैं, तू ही अपने पिता और मेरी भावी आशाओं का केन्द्र है. मैं चाहती हूं कि तू अपने समय का एक आदर्श महापुरुष बने, इसलिये मैं नित्य नील सरस्वती की उपासना करती हूं.

अपनी मां के प्रेरक वचन सुनकर विष्णु शर्मा (चाणक्य) ने अत्यन्त श्रद्धा से उनकी और देखा और उन्हें लगा कि उनके सामने साक्षात नील सरस्वती ही खडी हैं.

बालक चाणक्य ने कहा, "मेरे लिये तो आप ही साक्षात नील सरस्वती हैं.  मैं आपके तथा पिता जी के विश्वास को झुठलाऊंगा नहीं."

एक दिन एक ऐसी घटना घटी जिसके कारण चाणक्य की मां अत्यन्त उदास हो गई.  एक ज्योतिषी उनके घर पधारे और अपने पुत्र के भविष्य के प्रति आशवस्त होने के लिये चाणक्य की मां ने अपने पुत्र की जन्मपत्री उन्हें दिखलाई.   जन्मपत्री देखकर ज्योतिषी ने बताया कि उसने आज तक ऐसी विलक्षण जन्मपत्री नहीं देखी.  इस बालक की जन्मपत्री  में तो ग्रहों का ऐसा योग पडा है कि वह आगे चलकर यशस्वी चक्रवर्ती सम्राट बनेगा.  यह भविष्यवाणी मिथ्या नहीं हो सकती.  यदि इस कथन की सत्यता की जांच करनी हो तो अपने पुत्र के सामने के दांत को गौर से देखना उस पर नागराज का चिन्ह अंकित होगा.

प्रसन्न होने के स्थान पर मां चिन्तित हो गई और सोचने लगी कि चक्रवर्ती सम्राट बन उनका पुत्र उन्हें व्यस्त होने के कारण समय नहीं दे पायेगा और पुत्र वियोग की चिन्ता में उनकी आंखों में आंसू आ गये.  उसी समय चाण्क्य लौट आये और मां की आंखों में आंसू देखकर कारण पूछा.  बहुत हठ करने पर मां नें अपने मन की शंका को बालक चाणक्य के सामने प्रकट किया.

चाणक्य ने दर्पण में जा कर अपने दांत को देखा,  वास्तव में वहां नागराज का चिन्ह अंकित था.  चाणक्य ने बिना किसी विलंब के एक पत्थर उठाया और  एक ही प्रहार से उस दांत को तोड दिया.  बालक चाणक्य ने रक्तसना दांत उठा कर मां के चरणों में रख दिया और कहा, " मां, अब नागराज चिन्ह अंकित दांत ही नहीं रहा तो मेरे चक्रवर्ती सम्राट बनने का प्रश्न ही नहीं.  मुझे तो मेरी माता का वात्सल्य ही चाहिये.  मां ने अपने पुत्र को सीने से लगा लिया.

नागराज के चिन्ह वाला दांत टूट जाने से विष्णुगुप्त चाणक्य चक्रवर्ती सम्राट तो नहीं बन सके पर अपनी मां के आशीर्वाद से चक्रवर्ती सम्राट निर्माता अवश्य ही बन गये और उनके नीति शास्त्र पर अनेकोनेक चक्रवर्ती सम्राट निछावर हो गये.

6 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

चाणक्य के विषय में कहानी अच्छी लगी ...आभार

Kailash C Sharma said...

माँ के लिये प्रेम और भक्ति का एक उत्कृष्ट उदाहरण..बहुत प्रेरक

Dr (Miss) Sharad Singh said...

चाणक्य के जीवन के संबंध में जानकारी भरी महत्वपूर्ण प्रस्तुति के लिए बधाई...

Bhagat Singh Panthi said...

मैंने आज पहली बार ये कहानी पढ़ी. बहुत अच्छी लगी. इससे ये मुझे शिक्षा मिली की अपनी पत्नी को अपने पुत्र की जन्म कुंडली किसी ज्योतिष से नहीं दिखवाने को बोलूँगा. क्योकि यहाँ मुझे ये लोकोक्ति याद आती है कि औरतों के पेट में कोई बात नहीं पचती जो युधिस्तिर ने कुंती को शाप दिया था.

hem said...

ek ma or ek bete ka pyar hi sadev bada hota hi or ek ma hi apne bete ki pahli guru hai

amarshiv said...

Maa ka khyal rakhne wali sachhai se avgat karaane k liye dhanyavad