हाईकू

बंद पलकें
और जागते सपने
 मेरा संसार
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छुआ उसने
जाने क्या सोच कर
पुलकित मैं
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घडी के कांटे
टिक टिक टिक टिक
बीता जीवन
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निगला कौन
अंतिम पहर उस
सोते चांद को
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धूप जलाती
या है शीतल करती
वहा पसीना
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नम नयन
व होठों पर कंपन
कथित मौन
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आ भी जा अब
ताक पर रख सब
वक्त नहीं है
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6 comments:

Rajesh Kumari said...

bahut umda haiku.bahut pasand aaye.

मो. कमरूद्दीन शेख said...

gagar me sagar. bahut bahut sundar prayas. badhai.

vidya said...

बहुत सुन्दर भाव...
मगर कुछ में आपने 5-7-5 का नियम नहीं रखा है जो हायेकु की विशेषता है..
घडी के कांटे
टिक टिक टिक टिक
बीता जीवन

..."टिक टिक करते" ---ऐसा कर दें.

कृपया मेरी टिप्पणी को अन्यथा ना लें..

सदा said...

वाह..बहुत बढि़या

मनीष सिंह निराला said...

behad sundar likha hai aapne.
very nice.
welcome.

दिगम्बर नासवा said...

सभी हाइकू लाजवाब ... कुछ ही पंक्तियों में सार लिख दिया ...