जिन चिरागों के भरोसे पर,बस्ती को था छोडा
वही अपने ठिकानों में, खुद आग लगा बैठे
पूछे तो भला कोई, इन दानिशमन्दों से
ले आये मजहब को, क्यों आज चौराहों पर
इन्सानियत रोती है, खुद हैरान खुदाई है
परस्तिश से है मुंह मोडा, ईबादत को भुला बैठे,
दिलों में नफ़रत भर, ले हाथों में तलवारें
क्या पाने निकले थे, क्या क्या ना गंवा बैठे
मौहल्ला तो वहीं पर है, कुछ लोग मगर कम हैं
हिन्दु - मुस्लिम बन जो, तवारीख भुला बैठे
जिन चिरागों के भरोसे पर,बस्ती को था छोडा
वही अपने ठिकानों में, खुद आग लगा बैठे
5 comments:
अगर उपर की पंक्तियों में थोड़ा और लय ले आयें
तो यह तो पूरा गीत गंगा बन जाये...
कुरेदते कुरेदते अपने ही घाव नासूर बन गये
इन तकरारों में आप ही आप मात्र रह गये।
sundar rachana hai ...
bahut ache vichar pesh kiye hain
ek acha sandesh diya hai aap ek pyari rachena ke madahyam se aaj ke eash duniya mein eash sandesh ko samenjena bahoot jaroori hai har ek insan kai liyai asha kareta hoon woh rab khuda bhagwan aap ke kalam mein or noor dai
कड़वी सच्चाई कह दी आपने...लेकिन क्या करें....." डरी सहमी इंसानियत बदहवास है, गुम इंसान के भी होश-हवास हैं"
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