यादों की तितलियां




बिछुड कर मुझसे तुम
हर सू हो गये हो
पहले सिर्फ मेरी जां थे
अब रूह हो गये हो

तलाशने की तुमको
अब जरूरत नहीं रही
हवाओं मे घुल के अब तुम
खुशबू हो गये हो

तम्हारे लिये अब सफर,
सफर नही रहा
फासलों से हट कर
खुद मंजिल हो गये हो

जब तक रहे करीब
न एहसास कर सका
जाना तुम्हारी कीमत
जब तुम दूर हो गये हो


रातों को, यादों की तेरी
दिल में तितलियां उडें
नीदें उडा के मेरी
खामोश सो गये हो

5 comments:

जेपी नारायण said...

फिरता है कैसे-कैसे खयालों के साथ वो,
उस आदमी की जामातलाशी तो लीजिए।
.............अच्छी रही।

परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर रचना है।बधाई।
तलाशने की तुमको
अब जरूरत नहीं रही
हवाओं मे घुल के अब तुम
खुशबू हो गये हो

shobha said...

वाह क्या बात है । बहुत सुन्दर विरह भरी कविता है । पढ़कर आनन्द आगया । कहा जाता है कि -
वियोगी होगा पहला कवि
आह से उपजा होगा गान
निकल कर नयनों से चुपचाप
बही होगी कविता अन्जान
आप भी महान कवि बन गए हैं ।
बधाई

राकेश खंडेलवाल said...

जब तक रहे करीब
न एहसास कर सका
जाना तुम्हारी कीमत
जब तुम दूर हो गये हो

अच्छा लिखा है मोहिन्दरजी

मीत said...

बिछुड कर मुझसे तुम
हर सू हो गये हो
बहुत अच्छा है भाई. बधाई