क्या से क्या हो जाये

हैं सिर्फ़ लफ़्ज अगर
दिल ही में रहने दो
और अगर मुहब्बत है
खुल के वयां हो जाये

दर्दे-दिल को समझो तुम
प्यार को महसूस करो
ऐसा न हो मेरे सनम
जिन्दगी, सजा हो जाये

मेरा ख्वाब भी तुम हो
और हकीकत भी तुम हो
जान पर मेरी हो बनी
और तेरी अदा हो जाये

न सही आज मगर कल तो
बनना है किसी की तुमको
क्यों न फ़िर मेरे लिये
सब तेरी वफ़ा हो जाये

हमसफ़र अगर दिलकश हो
गर्दिशे-सफ़र कुछ भी नहीं
साथ तुम जो मेरे चलो
फ़िर क्या से क्या हो जाये

3 comments:

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत सुंदर कहा ....

Advocate Rashmi saurana said...

vakai bhut sundar badhai ho. ati uttam. likhate rhe.

Mired Mirage said...

बहुत सुन्दर !
घुघूती बासूती