अपना पता दे दो

कहां जा बसे हो अपना कुछ पता दे दो
हो गई हो खता तो जो चाहे सजा दे दो

हसीन पल सारे तुम साथ ले गये अपने
न हो वास्ता जिससे वो बाकी बचा दे दो

करो आजाद हमको यादों की डोर से अपनी
गर ये नहीं मुमकिन भुलाने की दवा दे दो

जल जल के अंगारा हो गये हैं हम कब से
मुकमिल राख जो कर दे ऐसी हवा दे दो

हमसे न निभाया कभी कोई वादा तुमने
हो गये हो जिसके उसे अपनी वफ़ा दे दो

10 comments:

makrand said...

achha likha mohinder ji
regards

Anupama said...

Really touchy...Good one

Anupama

anuradha srivastav said...

हमसे न निभाया कभी कोई वादा तुमने
हो गये हो जिसके उसे अपनी वफा दे दो
बहुत खूब .........

रंजना [रंजू भाटिया] said...

करो आजाद हमको यादों की डोर से अपनी
गर ये नहीं मुमकिन भुलाने की दवा दे दो

बहुत खूब

शोभा said...

वाह बहुत सुन्दर।

रंजना said...

भावपूर्ण बहुत सुंदर ग़ज़ल है.

मनुज मेहता said...

bahut khoob mohinder ji
kafi achhi gazal hai

manvinder bhimber said...

bahut sunder

मोहन वशिष्‍ठ said...

हमसे न निभाया कभी कोई वादा तुमने
हो गये हो जिसके उसे अपनी वफ़ा दे दो

well said mahinder ji very Best GAZAl

अनुपम अग्रवाल said...

मुझे याद आ रहा है ,कहीं सुना था;
तुम्हारी बेवफाई का मुझे शिकवा नही कोई
गिला तब हो जब तुमने किसी से भी निभाई हो