दो /चार लाईनर - कुछ स्वछंद विचार

विचारों पर मनुष्य का कोई जोर नहीं चलता... इनका प्रवाह बना ही रहता है.. चलते फ़िरते, सोते जागते यह निर्विघ्न आते जाते रहते हैं..इन्ही विचारों के माध्यम से मनुष्य शारीरिक रूप में कहीं और होते हुये...मानसिक रूप में न जाने कहां कहां विचरण कर आता है.

लेखकों, रचनाकारों और कवियों पर इसका अधिक प्रभाव देखा गया है क्योंकि नई रचना के प्रस्तुतिकरण के लिये इनके दीमाग के घोडे सरपट दौडते ही रहते हैं. विचारों का जिस गति से उत्सर्जन होता है उसी गति से ह्वांस भी हो जाता है... पल भर मे सोची गई लय ताल पटरी से उतर जाती है और शब्द/बोल हवा में विलीन हो जाते हैं यदि सहेजा न जाये.

कभी कभी दो लाईन, एक शेर, एक क्षणिका लम्बी चौडी गजल या कविता पर भारी पडती है और उसका अस्तित्व अकेले में ही असरदार रहता है जैसे जंगल में एक शेर ही काफ़ी हो.... यदि उन्हीं दो लाईनों को किसी कविता में या गजल में डाल दिया जाता है तो ऐसा लगता है शेर जंगल से पकड कर पिंजरे में डाल दिया है...

कहने का प्रयाय यह है कि आवश्यक नहीं कि कोई मौलिक विचार एक पूर्ण रचना बन कर प्रभावित कर पाये...जितना कि वह अकेले में कर पायेगा.

कुछ ऐसे ही दो लाईनर आपके अवलोकन व पठन हेतु प्रस्तुत हैं...आपकी टिप्पणी ही इनकी सार्थकता का प्रमाण होंगी

नहीं संभलता अगर तो बांट लो मुझ से
दर्दो-गम की बात है, दूसरी शय की नहीं

अपने हिस्से की धूप-छांव पा गये जमीं पर सभी
जलता ठिठूरता रहा खुला आसमां सिमट न सका

मुकाम दोस्ती का बना कर गिरा दिया उसने
हर्फ़े-मुहब्बत खुद लिख कर मिटा दिया उसने
भला इस खाक में कहां खोये लफ़्ज मिलते है
चुनके दौलत रिश्तों मे फ़ासला बढा लिया उसने

खून से लिखा हो या लिखा सियाही से
भला "वफ़ा" के माईने कहां बदलते हैं
लगा के आग खुद ही हसरतों में अपनी
हम दिवाने अंधेरों के लिये जला करते हैं

कुछ नहीं, पर कुछ तो है, शराब में
तासीरे-हवा, जैसे भरी है, हुबाब में
सन्नाटा, कोई नही है, तन्हाई में
मिलता, सिर्फ़ सवाल है, जबाब में

तासीरे-हवा = हवा का गुण (रूप)
हुबाब = पानी का बुलबुला

मेरी बेताबी,वफ़ा को माप सके,ऐसा पैमाना नही जहां में कोई
जूनूं की हदों से गुजरोगे तब कहीं तुम प्यार मेरा पहचानोगे

9 comments:

रंजना [रंजू भाटिया] said...

सही कहा आपने मोहिंदर जी ..ऐसा अक्सर होता है कुछ पंक्तियाँ आई और फ़िर उन्हें किसी वजह से पूरा नही किया जा सका :)यह बहुत पसंद आई मुझे

मेरी बेताबी,वफ़ा को माप सके,ऐसा पैमाना नही जहां में कोई
जूनूं की हदों से गुजरोगे तब कहीं तुम प्यार मेरा पहचानोगे

अजित वडनेरकर said...

सुंदर...
दीवाली की शुभकामनाएं...

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत सुंदर ! आपको भी दीपावली की शुभकामनाएं !

मनुज मेहता said...

bahut sunder mohinder bhai, diwali ki shubhkamnaye

रंजना said...

एकदम सही कहा आपने.ऐसे फुटकर शब्द समूहों को यदि बाँध कर न रख दिया जाए तो लुप्त विलीन हो जाती हैं जो कि अपने आप में असीम सुन्दरता समेटे होती हैं.
आपकी ये फुटकर रचनाएँ स्वयं ही प्रमाण दे रही हैं,कुछ अधिक कहने की आवश्यकता नही..

शोभा said...

achha style hai.

makrand said...

good composition
regards

गिरीश बिल्लोरे "मुकुल" said...

ati sundar
कुछ नहीं, पर कुछ तो है, शराब में
तासीरे-हवा, जैसे भरी है, हुबाब में
सन्नाटा, कोई नही है, तन्हाई में
मिलता, सिर्फ़ सवाल है, जबाब में

Udan Tashtari said...

यह प्रयास भी बेहतरीन है. कितनी ही टूटी पंक्तियां डायरी का हिस्सा बनी पड़ी रह जाती है..बहुत सही॒!!

आपको एवं आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक मंगलकामनाऐं.