बस एक ख्याल भर है

अजनबी आज वही राहें हैं कभी जिन पर रोज चला करते थे 
वह सपने आज अपने नहीं जो आँखों को रोज छला करते थे

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तेरे शहर मेँ बता जख्म अपने दिखाऊँ किसको

हर एक हाथ मेँ यहाँ नश्तर नजर आता है  मुझे

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जानता हूँ शाखे तमन्ना तब तलक रहेगी ये हरी

खाक बन न उड जाऊँगा जब तलक सँसार से
जो भी लेना हो तुम्हेँ मुझसे ले लो मेरे यार तुम
बात इतनी सी है कि बस बात कर लो प्यार से

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न दबता गर पैरोँ से, न चाक पर चढा होता

न बनता कोई दीप, न आज एक घडा होता
था माटी बिन शक्ल, बिना किसी मकसद के
आज भी यूँहीँ कहीँ, उसी माटी सा पडा होता

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हैँ पत्थर से बने लोग और काँच के रिश्ते
चाहेँ जन्मोँ के बँधन मगर साँस तक रिश्ते

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हसीन चेहरे नहीँ सहेजता कोई भी आईना

जब जो देखता है वही दिखाता यह आईना
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वो नहीँ मुस्करायेगा, वो नहीँ जानता कि खुशी क्या है
फूल हैँ पाँव तले मगर, उसके लिये सफर है रास्ता है

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अपने दौर के लोगों से ही करना अपने बीते कल की बातें 
तब की दाल रोटी से ज्यादा हैं आजकल मोबाइल के खर्चे


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जिन्दगी लुटा दी मैँने जिस खुशी के लिये
मिली जब वो तो सिर्फ पल भर के लिये

3 comments:

yashoda Agrawal said...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार 17 नवम्बर 2016 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

Malti Mishra said...

बहुत खूब

Malti Mishra said...

बहुत खूब