चंद शेर जो गजल न बन सके


गैर के हिस्से के आंसू भी बहाये हमने
उम्र भर रिश्तों में पैवन्द लगाये हमने
मेरे दर्द का अहसास किसी को भी हो
इस तरह अपने सब जखम छुपाये हमने
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अब कोई चेहरा कोई उम्मीद नहीं मेरी आंखों में...
वक्त के तूफ़ां में उडते बस तिनके नजर आते हैं
तुम कहते हो कि बसा लूं मैं इक घर फ़िर से
मुझे देख क्या तुम्हें ऐसे हालात नजर आते हैं
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जिस ने उमर भर सिर्फ आस जी,
जिस ने उमर भर सिर्फ प्यास पी,
साँसोँ मेँ तरन्नुम कहाँ से लाये वो
होँठोँ पर तबस्सुम कहाँ से लाये वो
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शायद सितारा कोई आसमां से टूटा
फ़िर जुगनुओं की बारात निकली है
बिन कहे वो चला गया महफ़िल से
फ़िर सोचते सोचते रात निकली है
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कुछ बोझ है बीती बातोँ का
कुछ अंजानी सी यह राहेँ हैँ
पर सफर की है ये मजबूरी
फर्क नहीँ अब दिन रातोँ का
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गुमां मंजिलों के थे जो दिल में पाले
वो बन गये आज मेरे पांव के छाले
चलना तो था दो तलबे भर जमीं पर
क्यूं सोचा जमीं-आसमां अपना बना ले
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याद जब तेरे पहलू में बिठा जाती है
रात चांद सितारों से बातों में जाती है
तेरी खुश्बू से महकता है जहन मेरा
कली दिल की फ़ूल सी खिल जाती है
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याद करना ना मुझे कह कर मयखाने से निकला था
क्या करूं मुझे भुला सके, तो साकी ही जाम
प्यास सहरा सी थी मेरी फ़िर भी खुद को संभाला था
क्या करूं आते रहे मुझे फ़िर भी उस दरिया के प्याम
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1 comment:

Madan Mohan Saxena said...

बहुत बेहतरीन .सुंदर पोस्ट।