ग़ज़ल

शबे - माहताब न रहेगी उम्र भर ऐ दोस्त 
तू  तारिकियों में भी काम चलाना सीख ले 

कब रास्ते में बहारें लेने लगें तेरा इम्तहां 
तू खिजां को अब अपना बनाना सीख ले 

मंजिल पर पहुँच कर ये राहें लौटती नहीं 
तू भी ख्वाबों से दिल को लगाना सीख ले 

सच यही है तेरे हाथ में कभी कुछ न था 
ये बात अपने दिल को समझाना सीख ले 

देर तक न रहा यहाँ किसी का भी ज़िक्र 
वादे अल्फ़ाज़ों के फ़साने भूलाना सीख ले 

                                    मोहिंदर कुमार

गजल

उन शाखोँ पर फिर से पत्ते नहीँ आये
जो काट डाली थी तूने अपने हाथ से
वह क्यारियाँ तरसीँ फिर हरी पौध को
जहाँ फूल जल गये थे भरी बरसात मेँ
यह बात मेरी समझ मेँ कभी नहीँ आई
है जिन्दगी से शिकवा, या मेरी बात से
जाने तलाश किस मँजिल की रही तुझे
खूबसूरत मरहले गुजरे यूँ आसपास से
दिल से तूने  कभी अपना नहीँ समझा
औरोँ के लिये रहे  तेरे खासमखास से