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विरोदाभासी चार पंक्तिया

एक दरिया के दामन में है जब रेत इतनी
जाने इस समंद्र में कितने सहरा डूबे होंगे

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जाम छोटा सा  और प्यास थी अर्स छूती
किस कदर मयकश इस जाम में डूबे होंगे

रिश्ते



अनकहे  अनसुने भी कुछ करार होते हैं
डूब कर भी तो दरिया पार होते हैं
रिश्ते निभाये जाते हैं आंख मूंद कर
परखने से तो रिश्ते तार तार होते हैं

मान से मनुहार से

नेह से, स्नेह से रिश्ते बंध जाते हैं

मान से, मनुहार से गये लौट आते हैं

इक घाव से क्यों टूटे डोर ये बरसों की

क्या अपने हाथों हम घाव नहीं खाते हैं