अक्सर ऐसा होता है कि चलते फ़िरते, उठते बैठते कुछ ख्यालात उभर आते हैं जो शायद अधुरे होते हुये भी अपने आप में पूरे होते हैं... उनमें चाह कर भी और कुछ जोड पाना मुमकिन नहीं हो पाता. ऐसे ही कुछ ख्यालात पेश हैं
सरपर्स्ती में कांटों की रहती हो
बुरा न मानो तो तुमको गुलाब कह दूं मैं
देख कर तुम को नशा सा छाता है
बुरा न मानो तो तुमको शराब कह दूं मैं
समन्दर की रेत पर
पांवों के निशां
बहती हवा के कांधों पर
हसरतों के वयां
मरहले प्यार के दुशवार हो गये
फ़ूल जो चुने सभी खार हो गये
ख्वाबों में बिछाई जो रेशमी चादर
हकीकत में वो उलझे तार हो गये
चांदनी चांद की कहां
एक कर्ज है धरती का उस पर
जिसे वह स्वंय रात दिन
सूरज की तपिश में जल कर
किश्तों में रात को लौटाता है
वक्त ने फ़िर मुहब्बत की दास्तान लिखी
दर्द की कलम और आंसुओं की सियाही से
दरबदर इक बदन ढूंढता है रुह को अपनी
फ़िर कोई बादल टूट कर रोया तबाही पे
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सागर की पीडा
करोडों जुगनू
सब जानते हैं
करोंडों जुगनू मिलकर भी
दिन में एक सूरज का सामना
नहीं कर सकते
मगर मैं यह भी जानता हूं कि
अरबों तारे (वस्तुत्: विशाल सूरज) भी
रात के अन्धकार में
एक जु्गनू की चमक को
फीका नहीं कर सकते
अर्थात विशाल धरा पर
रेत का एक कण चाहे
आकार मैंशून्य समान है
परन्तु उसके अस्तित्व को
धरा की विशालता के संमुख
नकारा नही जा सकता
मोहिन्दर
करोंडों जुगनू मिलकर भी
दिन में एक सूरज का सामना
नहीं कर सकते
मगर मैं यह भी जानता हूं कि
अरबों तारे (वस्तुत्: विशाल सूरज) भी
रात के अन्धकार में
एक जु्गनू की चमक को
फीका नहीं कर सकते
अर्थात विशाल धरा पर
रेत का एक कण चाहे
आकार मैंशून्य समान है
परन्तु उसके अस्तित्व को
धरा की विशालता के संमुख
नकारा नही जा सकता
मोहिन्दर
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