
मानव कच्ची माटी का घडा, नितदिन इक नयी आस
घट तक भर जाने पर भी बुझे न इस मन की प्यास
सुख दुख से परहेज क्या, यह हैं जीवन के दो स्वाद
सुख बांटे से हो सौ-गुना, और दुख बांटे से हो आध
तेरा मेरा जग में कछु नहीं बस विधि ही खेल खिलाये
जब मिले तो छ्प्पर फ़ाडी के और खाल खींच ले जाये
जोगी बनना नहीं खेल है सब छोड छाड लो धूनि रमाय
इस जन्म में फ़िरे जो मांगता वो अगला जन्म गंवाये
वा संग ही प्रीत लगाईये जो अन्त तक न छोडे साथ
"मोह" ऐसा जग में बस एक है हरि नाम या हरि नाथ